Wednesday, 29 April 2015

याद करने का आसान तरीका

                                                        "दोस्तों ध्यान से पढ़ बहुत महत्वपूर्ण हैं"

१- जब भी कोई उत्तर याद करना हो, तो एकान्त में किसी शान्त जगह पर बैठना चाहिए.
२- याद करते समय हमारा दिमाग पूरी तरह से ठण्डा होना चाहिए. उस समय किसी तरह की हड़बड़ी, परेशानी, उथल-पुथल, तनाव, चिन्ता, दु:ख, क्षोभ या क्रोध नहीं होना चाहिए.
३- जिस उत्तर को याद करना है, उसे रटना नहीं चाहिए. रटने का मतलब है बिना सोचे-समझे उत्तर के केवल कुछ शब्दों या एक-दो वाक्यों को ही जल्दी-जल्दी बार-बार दोहराना. रटने से उत्तर दिमाग में गहराई से बैठ नहीं पाता और जल्दी ही भूल जाता है. याद करने की यह परम्परागत पद्धति गलत और अवैज्ञानिक है.
४- वैज्ञानिक पद्धति से याद करने के लिये अपने उत्तर को धीरे-धीरे, रुक-रुक कर, समझ-समझ कर एक बार में शुरू से अन्त तक पूरा एक साथ ही पढ़िए.
५- उसके बाद अपनी उत्तर-पुस्तिका (NOTE-BOOK) को बन्द कर के ऊपर आसमान में देखते हुए पूरे उत्तर को एक सिरे से दूसरे सिरे तक अपने दिमाग में घुमाइए. इससे पूरे उत्तर की मोटी-मोटी रूप-रेखा पर दिमाग की पकड़ बन जायेगी.
६- इन दोनों क्रियाओं को कुल पाँच बार एक साथ ही दोहराइए. अर्थात पाँच बार पूरे उत्तर को धीरे-धीरे समझ-समझ कर पढ़िए और फिर उत्तर-पुस्तिका को बन्द कर के दिमाग में पूरे उत्तर को घुमाइए.
७- अब अपनी उत्तर-पुस्तिका को बन्द करके एक तरफ रख दीजिए. और अपनी रफ़ की कॉपी खोल लीजिए. उस पर ऊपर दिनांक और समय लिख लीजिए.
८- अब पूरे उत्तर को बिना नक़ल मारे जल्दी-जल्दी तेज रफ़्तार से लिखिए.
९- लिखने के दौरान उत्तर के बीच-बीच में कोई-कोई चीज़ भूल जायेगी. उसके लिये खाली जगह छोड़ते चले जाइए.
१०- इस तरह से पूरा उत्तर लिख डालिए और तब घड़ी देखिए और उत्तर लिखने में लगा समय नोट कर लीजिए.
११- अब अपनी उत्तर-पुस्तिका खोलिए और लिखते समय जितने शब्द या वाक्यांश याद न आने के कारण छूट गये थे, उनकी खाली जगहों को उत्तर-पुस्तिका से देख कर दूसरे रंग की स्याही से भर दीजिए.
१२- अब एक बार और अपने पूरे उत्तर को दिमाग में घुमा कर नये पन्ने पर समय नोट कर के लिख डालिए.
१३- इस तरह आप अपने प्रयोग के अन्त में देखेंगे कि आपको न केवल उत्तर याद हो गया, बल्कि आपका आत्मविश्वास भी बढ़ गया और जब एक बार आत्मविश्वास पैदा हो गया, तो फिर तो कोई भी उत्तर आपके लिये बड़ा या कठिन लगेगा ही नहीं.
१४- यदि आप इस प्रयोग से सन्तुष्ट और प्रसन्न होते हैं, तो मेरा निवेदन है कि अपने आस-पास के लोगों को भी इसे सीखने के लिये प्रोत्साहित कीजिए.
१५- अधिक से अधिक छात्रों और विद्यालयों तक इसे पहुँचाने के काम में मेरी सहायता कीजिए.
१६- इसको सीखने में अगर आप कोई दिक्कत महसूस करते हैं, तो आपकी सहायता करने के लिये मैं विनम्रतापूर्वक उपलब्ध हूँ
प्रिय मित्र, अपनी पढ़ाई के घण्टे बढ़ाने में समय-प्रबन्धन के मकसद से डेली डायरी बनाना छात्रों-छात्राओं की मदद करता है. इसमें भागीदार सभी छात्रों-छात्राओं को उनके दैनिक अध्ययन-काल का सटीक रिकार्ड प्रतिदिन बनाने का हम निर्देश देते हैं.
किसी भी व्यक्ति को एक दिन में केवल चौबीस घण्टे मिलते हैं. यह समय तीन खंडों में विभाजित किया जा सकता है — उत्पादन-काल, तैयारी का काल और मनोरंजन का काल. हम में से ज्यादातर लोग अपने जीवन के लक्ष्य के बारे में गंभीरता से विचार किये बिना अथवा अपने कार्य-दायित्व पर अच्छी तरह ध्यान दिये बिना अपने महत्वपूर्ण समय को निरर्थक कामों में ही बर्बाद करते रहते हैं.
समय-प्रबन्धन की इस पद्धति में जब भी कोई व्यक्ति व्यवस्थित तरीके से अध्ययन आरम्भ करता है, तो अपनी डेली डायरी में एक सेंटीमीटर चौड़े चार खाने और पाँचवां खूब चौड़ा खाना खींच कर पहले खाने में ‘दिनांक और पूर्वाह्न या अपराह्न (am./p.m.)’ लिख देता है, दूसरे खाने में ‘बजे से, तीसरे में ‘बजे तक और चौथे में ‘घंटा-मिनट’ लिख कर अंतिम सबसे चौड़े खाने में ‘किये गये कार्य का विस्तृत विवरण’ लिखता है.
अब वह पहले खाने में प्रतिदिन दिनांक और पूर्वाह्न या अपराह्न (am./p.m.) अंकित करके ‘बजे से’ नामक दूसरे खाने में पढ़ाई शुरू करने का सही-सही समय और ‘बजे तक’वाले तीसरे खाने में पढ़ाई खत्म करके अपनी पढ़ाई की मेज छोड़ने का सही-सही समय तुरन्त-तुरन्त लिखता है. क्योंकि इन दोनों प्रविष्टियों को बाद में लिख लेने के आलस्य के चक्कर में सही समय दिमाग से उतर जाता है और अनुमान से लिखा गया समय गलत हो सकता है. चौथे ‘घंटा-मिनट’ वाले खाने में उस एक बार के बैठने में किये गये काम का अध्ययन-काल घंटा-मिनट में तीसरे खाने की प्रविष्टि में से दूसरे खाने की प्रविष्टि को घटा कर लिख देता है. और सबसे चौड़े खाने में पढ़े गये विषय और पाठ का नाम, किस प्रश्न से किस प्रश्न तक हल किया या पढ़ा गया या याद किया, उनका क्रमांक और हल किये गये कुल प्रश्नों की पूरी संख्या अच्छी तरह विस्तार में लिखी जाती है.
इस तरह दिन भर का रिकार्ड बना कर अन्त में पूरे अध्ययन-काल के योग को जोड़ने के बाद अगले दिन सभी छात्र-छात्राएँ अपनी डायरी अपने अभिभावक से हस्ताक्षर करवा कर मुझसे चेक करवाने और मेरे हस्ताक्षर के लिये मेरे सामने प्रस्तुत करते हैं और अपने उपस्थिति-रजिस्टर में P/A की जगह अपने पढ़ने का समय लिखते हैं.
इस प्रकार समय-प्रबंधन की प्रतिदिन की डायरी उनकी इच्छा-शक्ति को बढ़ा देती है और उनके तैयारी और मनोरंजन में लगने वाले समय को नियंत्रित कर के उनके उत्पादन-काल में भरपूर वृद्धि करती जाती है. इस पद्धति से प्रत्येक छात्र-छात्रा केवल दो या तीन घंटे के अध्ययन के साथ अपनी दैनिक डायरी बनाने की शुरुवात करता है और देखते-देखते धीरे-धीरे आसानी से दस या उससे अधिक घंटे तक जा पहुँचता है और अपने अध्ययन के उस स्तर को बनाये रखने के लिये और उसके रिकॉर्ड में पिछले दिन की तुलना में और भी अधिक वृद्धि करने की कोशिश करता चला जाता है.
अब वह अपने प्रदर्शन पर स्वयं तो गर्व महसूस करता ही है, अपने दोस्तों को भी इस प्रणाली का पालन करने के लिये प्रोत्साहित करता है. उसके परिजन भी उसके व्यक्तित्वान्तरण से गौरवान्वित होकर उसे प्रोत्साहित करते हैं. समय की सटीकता के प्रति उनकी दृष्टि में सुधार के लिये हम उन के बीच सच्चाई के प्रति सम्मान की भावना विकसित करने की कोशिश करते हैं और उनमें से ज्यादातर गलत प्रविष्टियों से बचते हैं. मेरे बच्चे मुझसे झूठ नहीं बोलते, क्योंकि मैं भी उनसे झूठ नहीं बोलता. हम परस्पर एक दूसरे का विश्वास करते हैं.
मैं अपने सभी युवा मित्रों से समय-प्रबंधन की इस प्रणाली का अनुसरण करने के लिये और इसके ज़रिये उनकी अपनी मनोदशा में होने वाले सकरात्मक परिवर्तन को खुद ही महसूस करने का अनुरोध करता हूँ. यह चिंता, अवसाद और अलगाव की भावना की सबसे अच्छी दवा है, जो आज के अनिश्चय, आपाधापी और भागमभाग के पूँजीवादी दौर में व्यापक रूप से पूरी दुनिया में अधिक से अधिक युवाओं का बुरी तरह पीछा करते हुए उन्हें हर-हमेशा व्यथित और बीमार बना रही है.
इस सिलसिले में अपने सभी ‘अतिवादी’ अति उत्साही युवा मित्रों से मेरा विनम्र अनुरोध है कि हर हालत में प्रतिदिन कम से कम छः घण्टे अवश्य सोयें. और सत्रह घंटों से अधिक किसी भी परिस्थिति में न पढ़ें. पूरी नींद दिमाग को ताजगी देगी और इससे कम सोने पर आपके स्वास्थ्य और स्वाध्याय दोनों पर बुरा असर पड़ेगा.

सुन्दर लिखना कौन नहीं चाहता! लिखने के लिये टाइप राइटर और फिर कम्प्यूटर के इस्तेमाल से पहले तो हाथ से ही लिखने का चलन था. अभी भी कहा जाता है - "पेन इज़ द बेस्ट मशीन". अभी भी आपको अक्सर हाथ से लिखने की ज़रूरत तो पड़ती ही है. और अगर आपने सुन्दर लिखा है, तो पढ़ने वाले को भी अच्छा लगता है. खास कर लिखित परीक्षा में परीक्षक पर आपकी राइटिंग का बहुत ही सकारात्मक असर पड़ता है. वही उत्तर अगर गन्दी राइटिंग में लिखा हो और वही उत्तर अगर सुन्दर राइटिंग में लिखा हो, तो मिलने वाले अंकों में फ़र्क पड़ जाता है. आपको मिलने वाले अंकों को बढ़ाने में आपकी राइटिंग एक महत्वपूर्ण और लाभकारी घटक है.
अक्सर लोगों को कहते सुना जाता रहा है कि सुन्दर हैण्ड-राइटिंग तो "गॉड गिफ़्टेड" होती है. या कि बचपन में जिसकी राइटिंग नहीं सुधरी, उसकी फिर जिन्दगी भर नहीं सुधर सकती है. परन्तु मेरा मानना है कि अगर आपमें इतनी अक्ल है कि आप अपने जूते के फीते बाँध सकते हैं, तो आप अपनी राइटिंग भी सुधार सकते हैं. इस लेख में सुन्दर लिखने का वैज्ञानिक तरीका बताया गया है. इस तरीके का परिणाम अद्भुत होता रहा है. पिछले दो दशकों में अभी तक दसियों हज़ार लोगों ने इस तरीके से अपनी राइटिंग सुधारी है.
क्या आप भी अपनी राइटिंग से असंतुष्ट हैं? क्या आप उसे सुधारना चाहते हैं? यदि हाँ, तो इस लेख में दिये गये सुझावों को ध्यान से पढ़िए. और यदि आप चाहें, तो इन सुझावों को लागू कीजिए. इसका कल्पनातीत परिणाम स्वयं ही आपके सामने कुछ ही दिनों के अभ्यास के बाद आ जायेगा.

                                             

१- आपकी कॉपी में खींची गयी लाइनों को ध्यान से देखिए. दो लाइनों के बीच 8 मिमी. की दूरी होती है.
२- एक ही लाइन पर हिन्दी को कपड़े की तरह लटकाया जाता है और अंग्रेज़ी को मोमबत्ती की तरह खड़ा किया जाता है. अर्थात हिन्दी के शब्दों के ऊपर 'शिरोरेखा' खींची जाती है और अंग्रेज़ी के शब्द 'अधोरेखा' पर लिखे जाते हैं.
३- हिन्दी के शब्दों के ऊपर शब्द के आरम्भ से एक मिमी पहले से शुरू कर के शब्द के अन्त के एक मिमी बाद तक एक ही शिरोरेखा खींची जाती है. बिना शिरोरेखा के लिखना या टूटी हुई शिरोरेखा बनाना सही नहीं है.
४- हिन्दी के अक्षर चार मिमी. लम्बाई के बनाने चाहिए. अर्थात दो लाइनों के ठीक बीचोबीच तक ही अक्षरों की लम्बाई होनी चाहिए. नीचे का आधा हिस्सा मात्राएँ देने के लिये प्रयोग किया जाता है.
५- सभी दो अक्षरों के बीच दो मिमी. और दो शब्दों के बीच छः मिमी. की समान दूरी रखनी चाहिए. एकरूपता सौन्दर्य का महत्वपूर्ण अंग है.
६- सभी सीधे अक्षरों को 90 अंश और घुमावदार अक्षरों को 45 अंश के कोणों पर बनाना चाहिए.
७- सभी टेढ़ी मात्राओं को 45 अंश के कोण पर बनाना चाहिए.
८- अंग्रेज़ी के बड़े अक्षर छः मिमी और छोटे अक्षर तीन मिमी की ऊँचाई के लिखने चाहिए.
९- लिखते समय पूरे पन्ने पर बायीं ओर एक इंच और दाहिनी ओर आधा इंच जगह खाली रखनी चाहिए. इसी तरह ऊपर की ओर एक इंच और नीचे की ओर भी आधा इंच जगह छोड़ देनी चाहिए.
१०- प्रत्येक नया पैराग्राफ शुरू करते समय बायीं ओर से तीन लाइनों के बीच की दूरी के बराबर अर्थात 16 मिमी जगह छोड़ कर लिखना शुरू करना चाहिए.
११- लिखने में केवल नीली या काली कलम का प्रयोग करना चाहिए. लाल कलम कॉपी जाँचने के लिये और हरी कलम जाँची गयी कॉपी को दुबारा जाँचने के लिये होती है. लिखने वाले को लाल या हरी कलम का प्रयोग नहीं करना चाहिए.
१२- शीर्षक के नीचे दो अधोरेखा और उपशीर्षक के नीचे एक अधोरेखा खींच कर शीर्षक के सामने (:—) तथा उपशीर्षक के सामने (—) चिह्न लगाना चाहिए.
१३- महत्वपूर्ण अंशों पर पाठक का ध्यान आकर्षित करने के लिये स्याही का रंग बदल दें, उसके नीचे अधोरेखा खींच दें, बोल्ड कर दें, या टेढ़े अक्षरों में (इटैलिक) लिख दें. और अगर महत्वपूर्ण अंश अधिक लम्बा है, तो उसके दाहिनी ओर किनारे की खाली जगह पर ऊपर से नीचे की ओर सीधी रेखा खींच दें.
१४- इस तरीके से अभ्यास करते समय शुरू में आपकी लिखने की रफ़्तार निश्चय ही धीमी होगी. मगर इससे बिलकुल घबराइए मत.
१५- धीरे-धीरे कर के सुन्दर लिखने का अभ्यास करने के साथ ही अपनी रफ़्तार भी बढ़ाते जाइए. आप देखेंगे कि आपकी लिखावट भी सुन्दर हो गयी और आपके लिखने की रफ़्तार भी बढ़ती जा रही है.
१६- बाद में अभ्यास बढ़ाने के साथ घड़ी देख कर तेज लिखना शुरू कर दें. ताकि परीक्षा में समय से सभी उत्तरों को हल कर ले जायें.
१७- यदि आप इस प्रयोग से सन्तुष्ट और प्रसन्न होते हैं, तो मेरा निवेदन है कि अपने आस-पास के लोगों को भी इसे सीखने के लिये प्रोत्साहित कीजिए.
१८- अधिक से अधिक छात्रों और विद्यालयों तक इसे पहुँचाने के काम में मेरी सहायता कीजिए.
१९- इसको सीखने में अगर आप कोई दिक्कत महसूस करते हैं, तो आपकी सहायता करने के लिये मैं विनम्रतापूर्वक उपलब्ध हूँ. मुझसे 09450735496 पर सम्पर्क कीजिए

Saturday, 25 April 2015

                                                              क्या आप जानते हैं?


तिरंगा का अभिकल्पना पिंगली वेंकैया ने किया था

 ध्वज की लम्बाई एवं चौड़ाई का अनुपात 2:3 है

गांधी जी ने सबसे पहले 1921 में कांग्रेस के अपने झंडे की बात की थी

प्रथम चित्रित ध्वज 1904 में स्वामी विवेकानंद की शिष्या भगिनी निवेदिता द्वारा बनाया गया था।

जन गण मन, भारत का राष्ट्रगान है जो मूलतः बंगाली में गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर द्वारा लिखा गया था।

 संविधान सभा ने जन-गण-मन को भारत के राष्ट्रगान के रुप में 24 जनवरी 1950 को अपनाया था।

सारनाथ में अशोक ने जो स्तम्भ बनवाया था

बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय द्वारा संस्कृत बाँग्ला मिश्रित भाषा में रचित इस गीत का प्रकाशन सन् 1882 में उनके उपन्यास आनन्द मठ में अन्तर्निहित गीत के रूप में हुआ

भारत के दो आधिकारिक नाम हैं- हिन्दी में भारत और अंग्रेज़ी में इण्डिया (India)। इण्डिया नाम की उत्पत्ति सिन्धु नदी के अंग्रेजी नाम "इण्डस" से हुई है। भारत नाम, एक प्राचीन हिन्दू सम्राट भरतजो कि मनु के वंशज ऋषभदेव के ज्येष्ठ पुत्र थे तथा जिनकी कथा श्रीमद्भागवत महापुराण में है, के नाम से लिया गया है। भारत (भा + रत) शब्द का मतलब है आन्तरिक प्रकाश या विदेक-रूपी प्रकाश में लीन। एक तीसरा नाम हिन्दुस्तान भी है जिसका अर्थ हिन्द (हिन्दू) की भूमि, यह नाम विशेषकर अरब/ईरानमें प्रचलित हुआ। इसका समकालीन उपयोग कम और प्रायः उत्तरी भारत के लिए होता है। इसके अतिरिक्त भारतवर्ष को वैदिक काल से आर्यावर्त "जम्बूद्वीप" और "अजनाभदेश" के नाम से भी जाना जाता रहा है। जो आज भारत के नाम से कहा जाता हैं

social knowledge

  1.  आंध्र प्रदेश का गठन तत्कालीन आंध्र राष्ट्रं और तेलुगु भाषी मद्रास प्रेसीडेंसी क्षेत्रोँ के देशी राज्य के संयोजन से हुआ है आंध्र की राजधानी कुरनूल राष्ट्रम् थी।
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  1. १९७१ में आसाम से अलग होने के पहले शिलांग असम और मेघालय की संयुक्त राजधानी थी
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  1.  चंडीगढ़ पंजाब और हरियाणा राज्यों और संघ शासित की राजधानी है और दो राज्यों से अलग हैं
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  1.  पणजी १८४३ से गोवा की राजधानी थी, जब यह पुर्तगाली शासित था।
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  1.  कोच्चित्रावणकोर-कोचीन राज्य की राजधानी थी जो १९५६ में नए राज्य केरला की राजधानी बना
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  1.  नागपुर केंद्रीय प्रांत और बरार (Central Provinces and Berar) की राजधानी थी जो १८६१ से १९५० तक एक राज्य था १९५० में इसके बनने के बाद यह मध्य प्रदेश की प्रमुख एकै बना नागपुर नए राज्य की राजधानी बना रहा1956 में, बरार (Berar) (विदर्भ (Vidarbha))मध्य प्रदेश से अलग किया गया था और बॉम्बे राज्य (Bombay State) में मिलाया गया इस प्रकार नागपुर ने एक शहर की राजधानी का दर्जा खो दिया सन् 1960 में नागपुर के समझौते के तहत, नागपुर महाराष्ट्र.की दूसरी राजधानी बना
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  1.  मुंबई (बॉम्बे) बंबई प्रेसीडेंसी (Bombay Presidency) की राजधानी थी जो १९५० तक एक राज्य था उसके बाद यह बॉम्बे राज्य (Bombay State) की राजधानी बन गया है जो गुजरात और महाराष्ट्र में 1960 में .विभाजित किया गया
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  1.  सन् 1960 में नागपुर के समझौते के तहत, नागपुर महाराष्ट्र की दूसरी राजधानी बन गया हालाँकि इस आशय की सूचना केवल १९८८ में दी गई भारत सरकार का इयर बुक अभी भी नागपुर को महाराष्ट्र की दूसरी राजधानी के रूप में उल्लेख नही करता है
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  1.  नागपुर समझौते के तहत विदर्भ में शामिल होने के लिए एक पूर्व शर्त थी कि महाराष्ट्र राज्य के, कम से कम एक सत्र के विधायी हर साल नागपुर में आयोजित किया जाना चाहिए . यह सत्र के विदर्भ की समस्याओं से निपटने के लिए विशेष रूप माना जाता है
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  1.  लाहौर पंजाब की राजधानी थी जब राज्य में 1936 में बनाया गया था। अब यह पाकिस्तान का एक भाग है।
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  1. गंगटोक 1890 के बाद से सिक्किम की राजधानी है। सिक्किम भारतीय संघ में 1975 में शामिल हुए .
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  1.  चेन्नई 1839 के बाद से मद्रास प्रेसीडेंसी (Madras Presidency) की राजधानी थी जो १९५६ में तमिलनाडु बना
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  1.  देहरादून उत्तरांचल.राज्य की राजधानी है यह शहर Gairsen (Gairsen) के रूप में बनाया जा रहा है राज्य की नई राजधानी है।

Wednesday, 8 April 2015

source of knowledge

                                                                    The Brilliant Knowledge (do you know)

व्यास नदी का पुराना नाम क्या हैं?
भारत का प्रथम फिल्म निर्माता कौन हैं?
हमारे शरीर में किसके कारण खून नहीं जमता हैं?
माथे के बीच मे चंदन लगाने से कौन सी ग्रंथि का पोषण होता हैं?
कंप्यूटर का पहला नाम क्या था?
कुछ जन्तुओ में नीला खून किसके कारण होता हैं?
मरी अम्मन मंदिर कहाँ स्थित हैं?
दिल्ली के प्रथम मुख्यमंत्री का क्या नाम हैं?
अफगानिस्तान के प्रथम राष्ट्रपति का क्या नाम हैं?
जापान के प्रथम शास्त्र के नाम का क्या नाम था?
इंग्लैंड के प्रथम मुख्यमंत्री का के नाम था?
गौतम बुद्ध का सबसे बड़ा मूर्ति कहाँ स्थित हैं?
उत्तर प्रदेश में कितने विश्वविद्यालय हैं?
सारनाथ का संग्रहालय कहाँ स्थित हैं?
                                                                     अंकित कुमार


जब पढने में मन न लगे तो क्या करे .



दोस्तो ,
अकसर प्रतियोगी परीक्षाओ की तैयारी करने वाले प्रतियोगियों के सामने यह समस्या आती है ,कि पढाई में मन नही लगता है । मगर पढना प्रतियोगी परीक्षा के लिए बहुत जरुरी है । तो मेरे अनुभव और विचार से तो सबसे पहले पढाई में मन न लगने के कारन का पता लगाना चाहिए कि आखिर पढाई में मन क्यों नही लग रहा है ?
मेरे विचार से कुछ सामान्य कारण ये हो सकते है :-
- पढाई का उपयुक्त माहौल का न होना ।
- पढने का उचित समय का न होना ।
- पढने के लिए उपयुक्त सामग्री का न होना ।
- उचित मार्गदर्शन का न होना ।
-अन्य कार्यो से व्यवधान ।
- एकाग्रता की कमी होना ।
- दृढ निश्चय का अभाव।
मेरे ख्याल से उपरोक्त सामान्य कारणों से सामान्यतः प्रतियोगी पढ़ नही पाते है , इनके अलावा भी कुछ अन्य विशेष कारण हो सकते है , जो अलग अलग लोगो के लिए अलग हो सकते है । आज हम इन्ही सामान्य कारणों की चर्चा करते है । इन कारणों में सबसे महत्वपूर्ण कारण जो है , वो है उचित मार्गदर्शन का न होना । उचित मार्गदर्शन का प्रतियोगी परीक्षाओ में अति महत्वपूर्ण स्थान है । जैसे आपको अगर दिल्ली जाना है , और आपको सही रास्ता मालूम नही , अगर आपको सही मार्गदर्शक नही मिला तो हो सकता है , कि आप किसी तरह से दिल्ली पहुच भी जाये मगर इसमें आपका बहुत सारा समय और धन खर्च हो सकता है । मगर सही मार्गदर्शक मिलने पर आप समय के साथ धन भी बचा सकते है , और अपनी मंजिल पर सही वक़्त पर पहुच सकते है । अतः सही ढंग से तैयारी शुरू करने के लिए एक उपयुक्त मार्गदर्शक अतिआवश्यक है । कई बार हम मेहनत और प्रयास तो बहुत करते है मगर सफलता नही मिलती है , दूसरी तरफ कुछ लोग कम मेहनत और कुछ प्रयास में ही सफल हो जाते है । इसका कारण उनका सही दिशा में सार्थक प्रयास होता है । जैसे - अगर हम कील को उल्टा पकड़कर कितनी भी जोर से दीवार में ठोंके वह नही ठुक सकती है , वही उसे सीधा कर देने पर वह थोड़े प्रयास से ही आराम से ठुक जाएगी । इसी तरह प्रतियोगी परीक्षा में सही दिशा में सही प्रयास बहुत जरुरी है ।
अब हम मूल मुद्दे पर आते है , कि कैसे हम पढाई में मन लगाये : -
सबसे पहले तो पढने के लिए एक लक्ष्य या उद्देश्य होना जरुरी है , यह हमारे लिए प्रेरक का कार्य करता है । अगर लक्ष्य विहीन है ,तो हमारी सफलता शंकास्पद होगी । अतः एक लक्ष्य होना अति आवश्यक है । एक से अधिक लक्ष्य होने से मन अधिक भटकता है और पढाई में मन नही लगता है ।
अब लक्ष्य निर्धारण के बाद समुचित तैयारी जरुरी है , अर्थात हमें अपने लक्ष्य के बारे में पूरी जानकारी जुटानी होगी , कि परीक्षा कैसे होगी ?
सिलेबस क्या है ?
पैटर्न किस तरह का है ?
प्रश्न किस तरह के आते है ?
पाठ्य सामग्री कहाँ से , कैसे मिलेगी ?
तैयारी की रणनीति क्या होगी ?
सफलता के लिए कितनी मेहनत जरुरी है ?
सफल लोगो की क्या रणनीति रही थी ? इत्यादि
अगर हम इन प्रश्नों के उत्तर प्राप्त कर लेते है तो , हमारी समास्या का आधा समाधान हो जायेगा । अब आधे समाधान के लिए हमें अपनी दिनचर्या को व्यवस्थित करना होगा । मतलब सेल्फ मेनेजमेंट 
यदि हम खुद को सही तरीके से प्रतियोगिता के हिसाब से नही ढाल पाते है, तो सफलता में संदिग्धता होगी । हमें अपनी पढाई का समय और घंटे अपनी क्षमता के अनुसार निर्धारित करने होंगे । और निर्धारित समय सरणी का द्रढ़ता के साथ पालन करना होगा । इसके लिए हम प्रेरक व्यक्तिवो , प्रेरक प्रसंगों, प्रेरक पुस्तकों आदि का सहर ले सकते है ।
पढाई करते समय ध्यान देने योग्य बाते :-
- पढाई हमेशा कुर्सी-टेबल पर बैठ कर ही करें , बिस्तर पर लेट कर बिलकुल भी न पढ़े । लेटकर पढने से पढ़ा हुआ दिमाग में बिलकुल नही जाता , बल्कि नींद आने लगती है ।
- पढ़ते समय टेलीविजन न चलाये और रेडियो या गाने भी बंद रखे ।
- पढाई के समय मोबाइल स्विच ऑफ़ करदे या साईलेंट मोड में रखे ," मोबाइल पढाई का शत्रु है "

- पढ़े हुए पाठ्य को लिखते भी जाये इससे आपकी एकाग्रता भी बनी रहेगी और भविष्य के लिए नोट्स भी बन जायेंगे ।
- कोई भी पाठ्य कम से तीन बार जरुर पढ़े ।
- रटने की प्रवृत्ति से बचे , जो भी पढ़े उस पर विचार मंथन जरुर करें ।
- शार्ट नोट्स जरुर बनाये ताकि वे परीक्षा के समय काम आये ।
- पढ़े हुए पाठ्य पर विचार -विमर्श अपने मित्रो से जरुर करें , ग्रुप डिस्कशन पढाई में लाभदायक होता है।

- पुराने प्रश्न पत्रों के आधार पर महत्वपूर्ण टोपिक को छांट ले और उन्हें अच्छे से तैयार करें ।
१० - संतुलित भोजन करें क्योंकि ज्यादा भोजन से नींद और आलस्य आता है , जबकि कब भोजन से पढने में मन नही लगता है ,और थकावट, सिरदर्द आदि समस्याएं होती है ।
११- चित्रों , मानचित्रो , ग्राफ , रेखाचित्रो आदि की मदद से पढ़े । ये अधिक समय तक याद रहते है ।
१२- पढाई में कंप्यूटर या इन्टरनेट की मदद ले सकते है ।
इस तरह से आप पढाई में मन लगा सकते है , अगर फिर भी पढाई में मन नही लगता तो आप टिपण्णी में अपनी समस्या लिख सकते है । आपकी सफलता की कामना के साथ आपका
अंकित कुमार 

Math Trick for all classes

4,4,4,4 =20 कैसे लाएंगे?

तीन क्रमागत संख्या को पलटने पे उस मूल संख्या से घटाने से १९८ अधिक हो जाता हैं  और मूल संख्या का योग करके १९८ से भाग करने पर ३३  प्राप्त होता हैं मूल संख्या क्या होगी?